लेखक: पवन जैन पदमावत
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह केवल समाचारों का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की आवाज़, जनहित की प्रहरी और सत्ता से सवाल पूछने वाली सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है। विडंबना यह है कि जो पत्रकार समाज के हर वर्ग के अधिकारों और समस्याओं के लिए संघर्ष करता है, वही कई बार अपने ही साथी पत्रकार के लिए एकजुट होकर खड़ा नहीं हो पाता। यही स्थिति आज पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनती जा रही है।
किसी भी पेशे की सबसे बड़ी ताकत उसकी पेशेवर एकजुटता होती है। यदि किसी चिकित्सक, शिक्षक या वकील के साथ कोई अनुचित घटना होती है तो उनके साथी बड़ी संख्या में उसके समर्थन में सामने आते हैं। विशेष रूप से वकालत के क्षेत्र में यह भावना स्पष्ट दिखाई देती है। किसी वकील के साथ विवाद होने पर अनेक अधिवक्ता उसके समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं। सही या गलत का निर्णय न्यायालय करता है, लेकिन अपने पेशे की गरिमा और साथी के सम्मान की रक्षा के लिए उनका सामूहिक स्वर एक मजबूत संदेश देता है।
इसके विपरीत पत्रकारिता के क्षेत्र में अक्सर अलग तस्वीर देखने को मिलती है। किसी पत्रकार के साथ अभद्रता, हमला, झूठे मुकदमे या उत्पीड़न की घटना होने पर पूरा पत्रकार समाज एक मंच पर दिखाई नहीं देता। कहीं संगठन अलग-अलग हैं, कहीं व्यक्तिगत मतभेद हैं, तो कहीं संस्थानों की प्रतिस्पर्धा बीच में आ जाती है। परिणाम यह होता है कि पत्रकारों की सामूहिक शक्ति कमजोर पड़ जाती है।
यह भी एक सच्चाई है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की जगह कई बार व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता, गुटबाजी, ईर्ष्या और एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की मानसिकता हावी हो जाती है। कुछ लोग साथी की उपलब्धियों से प्रेरणा लेने के बजाय उसकी आलोचना करने या उसे कमजोर साबित करने में अधिक रुचि लेते हैं। ऐसी सोच न केवल व्यक्ति को बल्कि पूरे पत्रकारिता जगत को नुकसान पहुंचाती है।
यह समझना आवश्यक है कि एकता का अर्थ किसी की गलती का समर्थन करना नहीं है। यदि कोई पत्रकार नैतिक या कानूनी रूप से गलत है तो उसका निर्णय कानून और न्याय व्यवस्था करेगी। लेकिन यदि किसी पत्रकार के साथ केवल इसलिए अन्याय हो रहा है क्योंकि उसने जनहित का मुद्दा उठाया या सत्ता से सवाल पूछे, तो ऐसे समय पूरे पत्रकार समाज का उसके साथ खड़ा होना आवश्यक है। यह किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता और गरिमा का प्रश्न होता है।
आज पत्रकारों के सामने कई नई चुनौतियां हैं। डिजिटल माध्यमों का विस्तार, सोशल मीडिया की तेज़ प्रतिस्पर्धा, फर्जी खबरों का बढ़ता खतरा, आर्थिक असुरक्षा और कई स्थानों पर रिपोर्टिंग के दौरान बढ़ते हमले इस पेशे को पहले से अधिक कठिन बना चुके हैं। ऐसे समय में पत्रकारों के बीच सहयोग, संवाद और विश्वास पहले से अधिक आवश्यक हो गया है।
पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर प्रकाशित करना नहीं, बल्कि समाज में सत्य, पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना भी है। यदि पत्रकार स्वयं अपने अधिकारों, सम्मान और सुरक्षा के लिए एकजुट नहीं होंगे, तो उनकी सामूहिक आवाज़ भी कमजोर होती जाएगी। इसलिए समय की मांग है कि व्यक्तिगत मतभेदों, संस्थागत प्रतिस्पर्धा और गुटबाजी से ऊपर उठकर पत्रकारिता के मूल्यों को प्राथमिकता दी जाए।
एक पत्रकार दूसरे पत्रकार का प्रतिस्पर्धी हो सकता है, लेकिन शत्रु नहीं। विचार अलग हो सकते हैं, संस्थान अलग हो सकते हैं, कार्यशैली अलग हो सकती है, लेकिन पत्रकारिता का उद्देश्य एक ही है—समाज के सामने सत्य को रखना। यदि इस साझा उद्देश्य को केंद्र में रखा जाए, तो पत्रकारिता की विश्वसनीयता और प्रभाव दोनों कई गुना बढ़ सकते हैं।
आज आवश्यकता किसी नए आंदोलन की नहीं, बल्कि नई सोच की है। जिस दिन पत्रकार एक-दूसरे की सफलता का सम्मान करेंगे, संकट की घड़ी में बिना किसी स्वार्थ के साथ खड़े होंगे और पत्रकारिता के हित को व्यक्तिगत हितों से ऊपर रखेंगे, उसी दिन लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ पहले से कहीं अधिक मजबूत, प्रभावशाली और सम्मानित दिखाई देगा।
पत्रकारिता की सबसे बड़ी शक्ति कलम नहीं, बल्कि पत्रकारों की आपसी एकता है। यदि यह एकता मजबूत होगी, तो लोकतंत्र भी उतना ही मजबूत होगा।
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